सुरेश वाडकर

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Sunday, May 24, 2015

गरीबी खत्म होगी या गाँव ?

गरीबी खत्म होगी या गाँव ?

क्या एक समय ऐसा आएगा जब गाँवों में सिर्फ अमीर लोग होंगे औऱ गरीब शहरों में जिदगी की जंग लड़ेंगे? क्या गाँवों deepको जिंदा रखने के रास्ते बंद होते जा रहे हैं? क्या तरक्की के लिए गाँवों को शहर बनाना जरूरी है? क्या शहर और गाँव एक खूबसूरत तारतम्य के साथ जिंदा नहीं रह सकते? इन सवालों पर चर्चा शुरू हो चुकी है। लेकिन जवाब मिलने में अभी लंबा वक्त लग सकता है।
वित्त बिल पर चर्चा के दौरान देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गाँवों की गरीबी मिटाने का सबसे आसान फॉर्मूला दे दिया। जेटली ने कहा गाँवों की गरीबी कम करनी है तो देश की अर्थ व्यवस्था में कृषि विकास का हिस्सा 15 प्रतिशत से ज्यादा करना होगा और इसके साथ ही जो लोग कृषि पर निर्भर हैं उनकी संख्या कम करनी होगी। जेटली के मुताबिक अगर कृषि पर निर्भर लोग कुछ और काम काज में लग जाएं तो गरीबी कम हो जाएगी। आसान शब्दों में फॉर्मूला ये है कि खेती कम लोग करें लेकिन उत्पादन ज्यादा करें। कम जमीन वाले और कम उत्पादन करने वालों के लिए कुछ और रोजगार का इंतजाम किया जाए।
Subham Photography (33)
फोटो शुभम श्रीवास्तव
असल में पिछले कुछ समय से राजनीति में जब भी धन की बात होती है तो घूम-फिर कर जमीन अधिग्रहण का ही मुद्दा उठने लगता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। वित्त मंत्री ने कहा कि जमीन अधिग्रहगण का कानून पास हो जाए तो देश में कृषि उत्पादन भी बढ़ जाएगा और खेती में नुकसान झेल रहे लोगों को दूसरा रोजगार भी मिल जाएगा। यानी सरकार बड़ी शिद्दत से ये मानती है कि जमीन के नए कानून से ही गाँवों की गरीबी दूर हो पाएगी। सरकार ऐसा क्यों सोच रही है ये आप भी समझ लीजिए।
सरकारी सर्वे के मुताबिक देश के छोटे किसानों में से 56 प्रतिशत ऐसे हैं जिनके पास सिर्फ 100 वर्ग मीटर की जमीन है। ऐसे किसान दूसरों के खेतों में मजदूरी या फिर दूसरे मौसमी धंधे करके अपनी जिंदगी चलाते हैं। सरकार मानती है कि ऐसे किसानों की जमीन अगर मार्केट रेट से ज्यादा में सरकार ले लेती है तो फायदा किसान का ही होगा। साथ ही किसान को जमीन अधिग्रहण के बाद उस इलाके में होने वाले विकास का भी फायदा मिलेगा औऱ रोजगार भी मिलेगा। सरकार ये भी मानती है कि कृषि के काम में लगे कई लोग कुछ और काम करने की इच्छा रखते हैं। उनके भी ‘एसपिरेशन’ हैं यानि अभिलाषाएं हैं। वो फैक्ट्रियों में, दफ्तरों में, शॉपिंग मॉल में काम करना चाहते हैं। ये आकांक्षाएं तभी पूरी होंगी जब उन्हें खेती से दूर होने का मौका मिलेगा। यानी कोई ऐसा रोजगार मिलेगा जो उनके लिए खेती से बेहतर हो। और सरकार की दलील ये है कि जमीन अधिग्रहण के बाद ही रोजगार के नए अवसर पैदा हो पाएंगे।
खेती छोड़कर नया रोजगार पाने का रास्ता गाँव वालों को शहर की तरफ ले जाएगा। इस पलायन की वकालत कई बरसों से हो रही है। छह साल पहले ही वर्ल्ड बैंक ये साफ कर चुका है कि अगर भारत में गाँवों से शहरों की तरफ पलायन रुका तो तरक्की की राह मुश्किल हो जाएगी। उस वक्त वर्ल्ड बैंक ने मनरेगा जैसी योजनाओं को भी तरक्की के लिए घातक बताया था। और इसमें कुछ हद तक सच्चाई भी है। मनरेगा की वजह से शहरों की तरफ पलायन में कमी जरूर आई थी।
गाँव और गाँव में रहने वालों की तकदीर को लेकर हो रही चर्चा से कुछ ऐसे सवाल उठने लगे हैं जो गाँवों के वजूद पर ही सवाल उठा रहे हैं। क्या एक समय ऐसा आएगा जब गाँवों में सिर्फ अमीर लोग होंगे और गरीब शहरों में जिदगी की जंग लड़ेंगे? क्या गाँवों को जिंदा रखने के रास्ते बंद होते जा रहे हैं? क्या तरक्की के लिए गाँवों को शहर बनाना जरूरी है? क्या शहर और गाँव एक खूबसूरत तारतम्य के साथ जिंदा नहीं रह सकते? इन सवालों पर चर्चा शुरू हो चुकी है। लेकिन जवाब मिलने में अभी लंबा वक्त लग सकता है।
गाँव का ढांचा बदला जाना तय है। गाँव से जुड़ी नीतियों का भी बदला जाना तय है। ये भी तय है कि गाँव अब शहरों से दूर नहीं रह सकता। बदलाव जरूरी है लेकिन किसी भी बदलाव से पहले गाँव वालों से भी पूछना पड़ेगा कि वो क्या चाहते हैं। कृपया उनके नागरिक अधिकारों को नजरंदाज ना करें। ऐसा नहीं हुआ तो मरहम ढूंढ़ते- ढूंढ़ते हम एक नया नासूर बना देंगे जिसका इलाज फिर किसी के पास नहीं होगा।
(लेखक न्यूज 24 में डिप्टी न्यूज डायरेक्टर हैं। ये उनके अपने विचार हैं)