सुरेश वाडकर

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Monday, March 2, 2015

पार्ट-2 : आधारहीन आधार कार्ड

पार्ट-2 : आधारहीन आधार कार्ड


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यूआईडी यानी आधार के मामले में यूपीए सरकार का रवैया अजीबोग़रीब है. सरकार संसद के अंदर कुछ कहती है. संसद के बाहर मीडिया से कुछ और कहती है और अदालत के अंदर जाकर बिल्कुल ही अगल बात कहती है. सरकार की अलग-अलग एजेंसियां यह भ्रम फैलाती हैं कि यूआईडी हर सरकारी काम के लिए ज़रूरी है, लेकिन कोर्ट में जाकर मुकर जाती हैं. सरकार से जब यह पूछा जाता है कि इस स्कीम पर कितने पैसे ख़र्च होगें, तो सरकार का जवाब बस इतना होता है कि सरकार ने अब तक तीन हजार करो़ड रुपये से अधिक खर्च कर दिया है. यह आज तक किसी को पता ही नहीं है कि इस स्कीम पर कितने ख़र्च होंगे. आधार के सर्वेसर्वा नंदन मनोहर नेलकेणी से जब यह पूछा गया कि क्या इस यूआईडी का ख़ुफ़िया विभाग या काउंटर इंटेलिजेंस जैसी एजेंसी से कोई रिश्ता है या नहीं, तो उनका जवाब था नो कमेंट्स. सवाल यह है कि यूआईडी यानी आधार को लेकर सरकार इतनी रहस्यात्मक मुद्रा में क्यों है? क्या छिपाया जा रहा है? क्यों छिपाया जा रहा है?
कई सालों से भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीआईए) ने विदेशी कंपनियों के साथ हुए समझौते को छिपा कर रखा. कई लोगों ने आरटीआई के तहत जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन कभी जवाब नहीं मिला. प्राधिकरण ने यह कभी नहीं बताया कि इसने एल-1 आईडेंटिटी सोल्युशन, एसेंचर और दूसरी विदेशी कंपनियों के साथ क्या समझौता हुआ है. मामला सीआईसी तक पहुंचा और सीआईसी ने प्राधिकरण को यह आदेश दिया कि भारत सरकार के द्वारा किसी विदेशी कंपनी के साथ अगर कोई समझौता होता है तो वह भारत के लोगों की तरफ से होता है, इसलिए प्राधिकरण को आधार से जुड़ी जानकारियां देनी पड़ेंगी. इस आदेश के बाद सिविल लिबर्टी एक्टिविस्ट गोपाल कृष्ण को इन समझौते का क़ाग़ज़ात उपलब्ध कराए गए, लेकिन यहां भी प्राधिकरण ने एक धोखा कर दिया. उन क़ाग़ज़ातों में सारी चीज़ें हैं, लेकिन एल1 आईडेंटिटी सोल्युशन और एसेंचर के साथ किए क़रार का तकनीकी व व्यावसायिक हिस्सा ग़ायब है. अब सवाल उठता है कि इन क़रारों में ऐसी क्या बात है, जिसे छुपाया जा रहा है.
दरअसल, 1 सितंबर, 2010 को भारत और एसेंचर कंपनी में क़रार हुआ था. हालांकि, इस बात का ख़ुलासा नहीं किया गया कि एसेंचर सर्विस लिमिटेड एक अमेरिकी कंपनी की सहायक कंपनी है, जो आयरलैंड के डबलिन से ऑपरेट करती है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्युशन भी एक अमेरिकी कंपनी है, जिसमें अमेरिका के ख़ुफ़िया और सैन्य अधिकारी इसके बोर्ड मेम्बर हैं और यह कंपनी अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी के साथ काम करती आई है. अब इस कंपनी का फ्रांस के साफ्रान ग्रुप में विलय हो चुका है. देश में लोगों का सारा बायोमीट्रिक डाटा इन्हीं दोनों कंपनियों को सौंपा जाएगा, क्योंकि इन क़रारों के मुताबिक़ यूआईडी की डाटा का ऑपरेशन इन्ही कंपनियों के हाथ में है. हैरानी की बात यह है कि साफ्रान ग्रुप में फ्रांस की सरकार की हिस्सेदारी है और साथ-साथ अगले चालीस साल तक चीन के साथ इनकी पार्टनरशिप है. कहने का मतलब यह कि जो डाटा यूआईडी के नाम पर जमा किया जा रहा है, वह सुरक्षित नहीं है. यह डाटा अमेरिका, फ्रांस और चीन के हाथ लग सकता है. इसकी कोई गारंटी नहीं है कि इसे किसी और देश को नहीं बेचा जा सकता है. इन जानकारियों का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है. इसका उदाहरण पाकिस्तान है. वहां भी यूआईडी की तरह पाकिस्तान के लोगों को परिचय पत्र दिया गया. वहां इसे नाड्रा कहा जाता है. बायोमैट्रिक जानकारियां ली गईं. पाकिस्तान की मूर्खता देखिए ये पूरी जानकारी अमेरिका को दे दी गई. इसके बदले में नाड्रा के चीफ मोहम्मद तारीक मलिक को इन देशों में काफ़ी पुरस्कार मिला. जिस तरह का आभामंडल भारत में नंदन नेलकेणी का है, वैसा ही पाकिस्तान के लोग मोहम्मद तारीक मलिक के बारे सोचते थे. अब हाल यह है कि पाकिस्तान के बारे में आईएसआई से ज्यादा सीआईए को पता रहता है. अमेरिका इन जानकारियों के चलते पाकिस्तान के लोगों पर नज़र रखने में कामयाब हो गया. अफ़सोस इस बात का है कि जो अवॉर्ड मोहम्मद तारीक मलिक को मिला, एक साल बाद वो हमारे नंदन नेलकेणी साहब को मिला है. मीडिया में यूआईडी का प्रचार जमकर होता है, अख़बार और टीवी को इससे पैसे मिलते हैं, इसलिए यूआईडी के इस डार्क साइड को कोई कुरेदने की कोशिश नहीं करता है. अफ़सोस इस बात का है कि यूपीए की सरकार को इन सब बातों की कोई फ़िक़्र नहीं है.
राज्यसभा में सरकार से एक सांसद ने सवाल पूछा कि सरकारी योजनाओं का फ़ायदा लेने के लिए क्या यूआईडी अनिवार्य है? इस सावल के जवाब में केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने साफ़-साफ़ मना कर दिया कि नहीं, यूआईडी किसी भी योजना के लिए अनिवार्य नहीं है, लेकिन ठीक दो घंटे के बाद वो संसद के बाहर आए और मीडिया में यह बयान दे दिया कि नहीं-नहीं… फिलहाल यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन भविष्य में अनिवार्य किया जाएगा. वैसे यह सरकार एक ही मुंह से दो तरह की बातें करने में एक्सपर्ट है. यह आधिकारिक तौर पर तो यह कहने से बचती है कि यूआईडी को अनिवार्य किया जाएगा, लेकिन इसे पिछले दरवाज़े से लागू कराने में सतत प्रयास कर रही है. सरकार के हर विभाग, हर इलाके में यूआईडी को अनिवार्य घोषित किया जा रहा है. चाहे वो ट्रेन टिकट हो, गैस सिलिंडर हो, किसी चीज़ का रजिस्ट्रेशन हो, यहां तक कि राशनकार्ड बनाने के लिए भी इसे अनिवार्य कर दिया गया है या फिर कोशिश हो रही है, जो सरासर ग़ैरक़ानूनी है.
आधार कार्ड का कोई क़ानूनी आधार ही नहीं है. यह देश का अकेला कार्यक्रम है, जिसे संसद में पेश करने से पहले ही लागू करा दिया गया. आज तक आधार योजना को हरी झंडी देना वाला क़ानून नहीं बना है, लेकिन हर दिन टीवी पर हमें दिखाया जा रहा है कि इतने करोड़ कार्ड बना दिए गए हैं. असलियत यह है कि यूपीए सरकार इस क़ानून को संसद में पास भी नहीं करा सकती है, क्योंकि संसदीय कमेटी ने इस योजना पर ही सवाल ख़डा कर दिया है. संसदीय कमेटी ने कहा है कि आधार योजना तर्कसंगत नहीं है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में एक केस चल रहा है. आधार के ख़िलाफ़ केस करने वाले स्वयं कर्नाटक हाईकोर्ट के जज रहे हैं. जस्टिस के एस पुट्टास्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट पिटिशन दायर की है. इस पिटिशन पर देश के कई सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों ने सहमति दिखाई है. सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देश के किस क़ानून के आधार पर लोगों के बायोमीट्रिक्स को जमा किया जा रहा है. देश में मौजूद सारे क़ानूनों को खंगालने के बाद पता चलता है कि ऐसा क़ानून सिर्फ जेल मैन्युल में है. यह स़िर्फ ़कैदियों का लिया जा सकता है. और इसमें भी एक शर्त है कि जिस दिन वो ़कैदी रिहा होगा, उसके बायोमीट्रिक्स से जुड़ी फ़ाइलों को जला दी जाएगा, लेकिन इस योजना के तहत सरकार लोगों की सारी जानकारियां जमा कर रही है और विदेश भेजने पर तुली है. ये गंभीर सवाल है, जिसका जवाब ढूंढना ज़रूरी है. वैसे सांसद रमा जोयस ने 19.1.2011 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में उन्होंने आधार योजना की संवैधानिकता पर सवाल उठाया था. इस चिट्ठी के जवाब में प्रधानमंत्री की भी चिट्ठी आई, लेकिन इसमें स़िर्फ यह लिखा था कि आपकी चिट्ठी मिल गई है. सवालों के जवाब नहीं थे.
अब तक आधार को लेकर सरकार झूठ ही बोलती आई है. पहले दावा किया गया कि यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसका डुप्लीकेट बनाना संभव नहीं है. यह दावा भी झूठा निकला. कई नकली और फ़र्ज़ी यूआईडी कार्ड की ख़बर सामने आ चुकी है. ऐसी भी ख़बर आ चुकी है कि एक ही व्यक्ति ने कई यूआईडी कार्ड बना लिए हैं. निजी कंपनियों को पैसा कमाने के लिए देश की जनता पर प्रयोग करने का किसी भी सरकार को अधिकार नहीं है. समझने वाली बात यह है कि कई देशों में अंतराष्ट्रीय एजेंसियों के कहने पर इस तरह के पहचान पत्र की योजना शुरू की. जब ब्रिटेन में यह काम शुरु हुआ तो भारत में भी नंदन नेलकेणी ने इसे उदाहरण बना कर भारत में इसकी शुरुआत की, लेकिन जैसे ही उन देशों को पता चला कि यह योजना लोगों के सिविल राइट्स के लिए ख़तरनाक है तो उन्होंने इसे बंद कर दिया, लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ. निजी कंपनियों के साथ सांठगाठ कर इस योजना पर काम शुरू हो गया, वो भी बिना संवैधानिक वैधता के. सवाल यह है कि किसी व्यक्ति विशेष को दुनिया भर में पुरस्कार मिले, इसके लिए क्या लोगों के अधिकार को ख़तरे में डाला जा सकता है. दरअसल, बात यहीं पर आकर रुक गई है, क्योंकि इस योजना को चालू रखने की न तो कोई दलील है, न कोई क़ानून है और न ही यह न्यायसंगत है. सरकार को यह जवाब देना होगा कि जब हमारे पास 16 विभिन्न प्रकार के पहचान पत्र पहले से ही हैं तो 17 वें की क्या जरूरत है.
दरअसल, सरकार और सरकार के नुमाइंदों को विदेशी दबाव के अंदर काम करने की लत लग गई है. निजी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाना ही सरकार की प्राथमिकता हो गई है, क्योंकि उन्हें लगता है कि निजी कंपनियों के लिए रास्ता साफ़ करना ही एक अच्छी सरकार की निशानी है. दरअसल, सरकार की मानसिकता ही दूषित हो चुकी है, इसलिए जनता का कल्याण ताक पर रख दिया गया है. कल यूआईडी योजना के अंदर ही कोई घोटाला निकले तो इसमें आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए. चुनाव आने वाले हैं, इसलिए यूआईडी पर भी विवाद होगा, बहस होगी. राजनीतिक दलों को अपना स्टैंड साफ़ करना होगा कि क्या वो देश के लोगों की जानकारी को विदेशी कंपनियों व सरकारों को सौंपने के पक्ष में हैं या विरोध में. वैसे कांग्रेस पार्टी के नेता बड़ा ख़ुश हैं कि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के सुपरमैन नंदन मनोहर नेलकेणी राजनीति में आ रहे हैं. बताया जा रहा है कि वो बेंगलुरु के किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे, जहां आईटी प्रोफेशनल की आबादी ज़्यादा है. अच्छे लोग राजनीति में आएं, इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन अच्छे लोग कौन हैं, इसकी क्या परिभाषा है, इस पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. अगर देश को अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल की ख़ुफ़िया एजेंसियों के इशारे पर देश के लोगों की गोपनीय जानकारियां विदेश भेजना, देश की ग़रीब जनता को विदेशी कंपनियों को निगलने के लिए रास्ता बनाना अच्छाई है तो वर्तमान संसद में 167 दाग़ी सासंद क्या बुरे हैं?
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