सुरेश वाडकर

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Sunday, February 15, 2015

भूमि अधिग्रहण कानून आखिर किसके लिए?

भूमि अधिग्रहण कानून आखिर किसके लिए?

भूमि अधिग्रहण कानून आखिर  किसके लिए?

आगरा एक्सप्रेसवे के लिए क्या किसान सहमत थे? वामपंथी राज में सिंगुर और नंदीग्राम का नजारा पुराना नहीं है। न नवी​ ​ मुंबई के बेदखल गांवों की कहानी पुरानी है। उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हरियामा के गांवों के सीने पर राजधानी के कायकल्प में हालांकि खून का  दाग नहीं दीख रहा है और न कातिलों के निशान कहीं हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण के पीछे की कहानी प्रकट है।परमाणु दीवानगी, इंफ्रास्ट्रक्चर, सेज, ​​इंड्सट्रीयल कारीडोर, मेगा सिटी और एनएसआईजेड के लिए जमीन अधिग्रहण के पैमाने बदल देने की छूट राज्य सरकारों को मिल ही रही है। खान परियोजनाओं का किस्सा अलग है। नियमागिरि में क्या हो रहा है, सभी जानते हैं। इस सिलसिले में खास बात तो यह है कि वेदांत से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धज्जियां उधेड़ते हुए कांग्रेस और भाजपा, पक्ष और विपक्ष ने हजारों करोड़ हड़प लिये। वनाधिकार अधिनियम, संविधान की पांचवीं छठीं अनुसूची, अभयारण्य, समुद्र्तट सुरक्षा अधिनियम, पर्यावरण कानून, स्थानीय निकाय कानून, पीसा, आदि कानूनों का उल्लंघन​ ​ करते हुए जमीन के काले धंधे में सभी राजनीतिक दलों के चेहरे कालिख से पुते हुए हैं, नये भूमि अधिग्रहण बिल से क्या हालात बदल जायेंगे?

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

भूमि अधिग्रहण कानून आखिर  किसके लिए? जमीन बेचने लिए 3 में से 2 मालिकों की सहमति लेना जरूरी होगा।सहमति हासिल करना क्या मुश्किल है धन बल बाहुबल और राष्ट्रशक्ति के सैन्यबल के आगे पहले ही निहत्था आदमी जल जंगल जमीन​​ और आजीविका के हक हकूक खो चुका है। सहमति और मुआवजा के जुमले उछालकर कारपोरेट हित में तैयार कानून का मसविदा अभी हाल में  सत्याग्रह यात्रा का अंत करने वाले समझौते पर सवालिया निशान खड़ा करता है। अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन के हस्तांतरण पर प्रतिबंध के ​​मद्देनजर सहमति का यह मुहावरा संवैधानिक सुरक्षाकवच को तोड़ने का काम जरूर करेगा।ज्यादातर आदिवासी गांव बतौर राजस्व गांव ​​रिकार्ड हैं नहीं, आदिवासियों को संविधान के पांचवीं और छठीं अनुसूची के मुताबिक स्वयत्तता का अधिकार या प्रकृतिक संसाधनों का मालिकाना हक मिला ही नहीं, भूमि सुधार लागू ही नहीं हुआ और नागरिकता बायोमैट्रिक हो गयी। पर उनकी सहमति से मुआवजा और पुनर्वास का गाजर​​ दिखाकर बिना प्रतिरोध जमीन छीनने का राजमार्ग तैयार हो रहा है। वनाधिकार कानून का हश्र क्या हुआ, क्या इससे सबक लेने की ​​जरुरत नहीं  है?राज्य सरकारों को अपने लिए अलग कानून बनाने की छूट दी गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे चुनिंदा मामलों में ही सरकार जबरन जमीन अधिग्रहण करेगी।रेलवे, पोर्ट, सड़क और नहरों के लिए जमीन लेने पर लोगों की राय लेना जरूरी नहीं होगा। लेकिन, 100 एकड़ से ज्यादा जमीन लेने पर 80 फीसदी लोगों की सहमति जरूरी होगी। नए कानून की हर 20 साल पर समीक्षा का प्रस्ताव है।ताकतवर लोग कैसे कानून की धज्जियां उड़ाकर जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, अरविंद केजरीवाल के ताजा खुलासे से इसमें सर्वदलीय साझेदारी बेनकीब हुई है। इसके मद्देनजर जमीन के अधिग्रहण में कोई गड़बड़ी नहीं होगी, इसकी क्या गारंटी है? जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में आंदोलित कई राज्यों में सैकड़ों ग़रीब किसानों एवं आदिवासियों को पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ा। उनका दोष स़िर्फ इतना था कि वे किसी भी क़ीमत पर अपनी पुश्तैनी ज़मीन देने के लिए तैयार नहीं थे। ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था। आज़ादी के बाद उसी क़ानून की आड़ में देश की सरकारों ने निजी स्वार्थ के चलते पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए करोड़ों किसानों एवं आदिवासियों को दांव पर लगा दिया। भूमि अधिग्रहण के चलते जिन किसानों की मौत हुई, उसे नरसंहार कहने में कोई गुरेज़ नहीं। इसकी ज़िम्मेदार केंद्र और राज्य की सरकारें हैं, जिनका दामन निर्दोष किसानों के खून से दाग़दार है।

गौरतलब है कि उदारीकरण का दौर शुरू होते ही जब सवा सौ साल पुराने भूमि अधिग्रहण क़ानून ने अपना असर दिखाना शुरू किया, तब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को यह मुद्दा अपनी छवि बनाने के एक अवसर के रूप में दिखा। नतीजतन, अपनी तऱफ से उन्होंने इस कानून में यथाशीघ्र संशोधन कराने की घोषणा कर दी। घोषणा चूंकि राहुल गांधी ने की थी, इसलिए उस पर संशोधन का काम भी शुरू हो गया।संशोधित बिल भी कॉरपोरेट घरानों के खजानों को भरने के लिए बनाया गया है। शायद तभी पूरे देश भर से हजारों लोग दिल्ली आकर इस क़ानून का तीन दिनों तक विरोध करते हैं। अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह में (21 से 23 अगस्त के बीच) ज़मीन की लूट और जन विरोधी संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिला़फ आयोजित जनमोर्चा में जंतर-मंतर पर हज़ारों लोग जुटे। ज़मीन की लूट और कॉरपोरेट्‌स के भ्रष्टाचार एवं शोषण के खिला़फ आयोजित तीन दिवसीय धरने एवं जनमोर्चा में यह बात सामने आई कि यूपीए सरकार उचित मुआवज़े, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन का अधिकार अधिनियम 2011 लाकर देश की संसद और लोगों को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है।

आगरा एक्सप्रेसवे के लिए क्या किसान सहमत थे? वामपंथी राज में सिंगुर और नंदीग्राम का नजारा पुराना नहीं है। न नवी​ ​ मुंबई के बेदखल गांवों की कहानी पुरानी है। उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हरियामा के गांवों के सीने पर राजधानी के कायकल्प में हालांकि खून का  दाग नहीं दीख रहा है और न कातिलों के निशान कहीं हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण के पीछे की कहानी प्रकट है।परमाणु दीवानगी, इंफ्रास्ट्रक्चर, सेज, ​​इंड्सट्रीयल कारीडोर, मेगा सिटी और एनएसआईजेड के लिए जमीन अधिग्रहण के पैमाने बदल देने की छूट राज्य सरकारों को मिल ही रही है। खान परियोजनाओं का किस्सा अलग है। नियमागिरि में क्या हो रहा है, सभी जानते हैं। इस सिलसिले में खास बात तो यह है कि वेदांत से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धज्जियां उधेड़ते हुए कांग्रेस और भाजपा, पक्ष और विपक्ष ने हजारों करोड़ हड़प लिये। वनाधिकार अधिनियम, संविधान की पांचवीं छठीं अनुसूची, अभयारण्य, समुद्र्तट सुरक्षा अधिनियम, पर्यावरण कानून, स्थानीय निकाय कानून, पीसा, आदि कानूनों का उल्लंघन​ ​ करते हुए जमीन के काले धंधे में सभी राजनीतिक दलों के चेहरे कालिख से पुते हुए हैं, नये भूमि अधिग्रहण बिल से क्या हालात बदल जायेंगे?


बहरहाल बहुप्रतीक्षित भूमि अधिग्रहण विधेयक को मंत्रियों के विशेषाधिकार प्राप्त समूह [जीओएम] ने मंजूरी दे दी। बिल को लेकर जीओएम के बीच आम राय बन गई है और अब भूमि अधिग्रहण बिल दो हफ्ते में कैबिनेट के पास भेजा जा सकता है। साथ ही भूमि अधिग्रहण बिल संसद के शीतकालीन सत्र में पेश हो सकता है।केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा, भूमि अधिग्रहण बिल दो हफ्ते में कैबिनेट के पास भेजा जा सकता है। साथ ही भूमि अधिग्रहण बिल संसद के शीतकालीन सत्र में पेश हो सकता है। ग्रामीण विकास मंत्री के मुताबिक ड्राफ्ट के तहत जमीन बेचने लिए 3 में से 2 मालिकों की सहमति लेना जरूरी होगा। जीओएम में जमीन बिक्री पर ग्रामसभा, पंचायतों की मंजूरी जरूरी करने पर चर्चा हुई है।

बीजेपी ने बुधवार को जमीन अधिग्रहण बिल पर किसी तरह की प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। पार्टी ने कहा कि इस बिल को पूरी तरह परख करने के बाद ही कोई टिप्पेणी करेंगे।

बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा कि पार्टी किसानों के हितों की रक्षा करने की पक्षधर है और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि देश का विकास जारी रहे। इसलिए पहले हम इस बिल के अंतिम स्वूरूप को देखना चाहते हैं और इसके बाद ही कोई ठोस प्रतिक्रिया देंगे।

उधर, कांग्रेस ने मंत्रियों के एक समूह द्वारा भूमि अधिग्रहण विधेयक के मसौदे को मंजूरी दिये जाने का स्वागत किया और कहा कि इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद किसानों और खासकर गरीब किसानों को फायदा होगा।

कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने यहां संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा कि जीओएम ने भूमिअधिग्रहण विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी है। अब यह कैबिनेट में जाएगा और उम्मीद है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इसे पारित कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में भूमि अधिग्रहण और भूमि सुधार के बारे में सौ साल पुराने कानून के स्थान पर एक नया कानून देश को देने का वादा किया था। सरकार इस वादे को लागू करने जा रही है।
अल्वी ने कहा कि इस नए कानून से किसानों और खासकर गरीब किसानों को फायदा पहुंचेगा।

जयराम रमेश का कहना है कि जमीन अधिग्रहण बिल 2 हफ्ते में कैबिनेट के पास भेजा जा सकता है। जमीन अधिग्रहण बिल संसद के शीतकालीन सत्र में पेश हो सकता है।

नए जमीन अधिग्रहण कानून के तहत प्रस्ताव है कि पब्लिक प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए कानून सख्त किए जाएंगे। पीपीपी प्रोजेक्ट में कंपनी के 90 फीसदी जमीन खरीदने के बाद ही सरकार का दखल होगा।मौजूदा जमीन अधिग्रहण पर भी मुआवजा नए कानून के तहत तय किया जाएगा। गांवों में जमीन के बाजार भाव का 4 गुना मुआवजा दिए जाने का प्रस्ताव है। शहरों में जमीन के बाजार भाव का 2 गुना मुआवजा देने का प्रस्ताव है।नए कानून के तहत हर विस्थापित को 5 लाख रुपये का मुआवजा देना होगा। साथ ही, विस्थापित परिवार को 20 साल तक 3000 रुपये प्रति महीना मुआवजा मिलेगा।जमीन अधिग्रहण बिल के तहत जमीन के मालिक को 20 फीसदी जमीन डेवलप करके वापस करनी होगी। जमीन का मालिकाना हक ट्रांसफर होने पर 10 साल तक मूल मालिक को मुनाफे का 20 फीसदी मिलेगा।

हालत यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ के बीच गुड़गांव में जमीन को लेकर हुए करार को रद्द करने वाले हरियाण के वरिष्ठ अधिकारी अशोक खेमका को अज्ञात लोगों की ओर से जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। यह दावा खेमका के करीबी मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता अनुपम गुप्ता ने किया है। गुप्ता ने मंगलवार को बातचीत में कहा कि खेमका ने मुझे बताया कि उन्हें कुछ फोन आए हैं, जिनमें फोन करने वाले की ओर से कहा गया है कि अपनी गतिविधियों पर रोक लगा दो नहीं तो खत्म कर दिए जाओगे।गुप्ता ने कहा कि धमकी देने वालों ने यह भी कहा है कि उन्होंने उन्हें (खेमका) मारने के लिए सुपारी दे रखी है। हरियाणा सरकार ने 11 अक्टूबर को लैंड कंसोलिडेशन एंड लैंड रिकॉर्डस-कम-इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रेशन के महानिदेशक अशोक खेमका के स्थानांतरण का आदेश दिया था। वह 15 अक्टूबर तक कार्यालय में थे और उन्होंने उसी दिन वाड्रा व डीएलएफ के बीच सौदा रद्द करने का आदेश दिया।

कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नेता अरविंद केजरीवाल को खुलेआम धमकी दी है। उन्होंने कहा कि बहुत दिन से उनके हाथों में कलम है। उन्हें वकीलों का मंत्री बनाया गया था और कहा गया था कि वो कलम से काम करें लेकिन वो अब लहू(खून) से भी काम करेंगे।अरविंद केजरीवाल के फर्रूखाबाद जाकर प्रचार करने पर सलमान खुर्शीद ने कहा कि अरविंद फर्रूखाबाद जाएं लेकिन लौट कर भी आएं फर्रूखाबाद से। सलमान ने ये भी कहा कि सवाल करने वाले भूल जाएंगे कि सवाल कैसे पूछा जाता है।

इन दोनों मामलों से जाहिर है कि जब समर्थ लोगों के सवाळ उठाने पर जान पर बन आती है तो निहत्था आम आदमी अगर भूमि ​​अधिग्रहण के लिए सहमत न हो , तो उसकी क्या गत हो सकती है।

मेधा पाटकर के मुताबिक  भूमि अधिग्रहण कानून का नया मसौदा तैयार है लेकिन इस गंभीर मसले को लेकर राजनीतिक पार्टियां और सरकार अभी भी ईमानदार नहीं दिख रहे हैं। इनकी प्राथमिकताओं में अभी भी औद्योगिक घराने हैं। भूमि अधिग्रहण कानून जिस साम्राज्यवादी सोच की उपज रहा है, उससे दिल्ली अब तक नहीं उबर पाई है। हाशिये पर पड़े लोगों की अनिवार्य आवश्यकताओं से अधिक उन्हें औद्योगिक घरानों की पूंजी के विकास की चिंता है। नए मसौदे में जिस व्यापक विकास नियोजन के कानून को प्रस्तावित करने की जरूरत थी वह नहीं दिखता। इसका कारण इतना भर दिखता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों द्वारा उठा आंदोलन किसी तरह दिशा भटक जाए या फिर शांत हो जाए।

`मेरी समझ से सबसे अहम जरूरत यह है कि कृषि से गैर कृषि कार्यों में जमीन का हस्तानांतरण बिल्कुल निषिद्ध हो। पर्यावरण रक्षण को देखते हुए हमने जिस तरह इस बात पर सैद्धांतिक सहमति बनाई है कि कुल भूमि का एक तिहाई हिस्सा वनों के लिए आरक्षित होना चाहिए उसी तरह इस बात पर भी सैद्धांतिक सहमति बननी चाहिए कि ज्यादातर भूमि को अनाज उत्पादन के कार्यों में ही उपयोग में लाया जाना चाहिए। इस संबंध में एक बड़ी जरूरत ग्राम सभाओं के अधिकार से जुड़ी है। ग्राम सभाओं को यह संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए कि उसकी सहमति के बगैर किसी भी तरह की भूमि अधिग्रहित न की जाए। अभी देश में करीब छह लाख गांव हैं और हमारा देश ग्रामीण पृष्ठभूमि का खेतीहर देश है, इसलिए किसी भी तरह के अधिग्रहण में गांवों की सहमति को अनिवार्य कर देना हमारी आवश्यकता है फिर जिस भी जमीन का अधिग्रहण हो, उसमें इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाए कि किस तरह सबसे कम विस्थापन हो। साथ ही पर्यावरण को भी कैसे कम से कम नुकसान पहुंचे।'

मेधा पाटकर के मुताबिक  आज हो यह रहा है कि हमारे किसान गलत अधिग्रहण कानून और अन्य नीतियों के कारण मजदूरों में तब्दील हो रहे हैं और इसने विस्थापन को भी काफी बढ़ावा दिया है। याद रखिए कि जब तक विस्थापन न्यूनतम स्तर पर नहीं होगा तब तक सही तौर पर पुनर्वास की व्यवस्था भी नहीं हो पाएगी फिर नए मसौदे में पुनर्वास की स्पष्ट और न्यायपूर्ण व्याख्या भी जरूरी है, जो अपना घर-बार और जमीन खो रहे हैं, उन्हें केवल कुछ पैसे और कहीं दूर दो कमरे का एक आवास दे देना भर पुनर्वास नहीं है। विस्थापन में जिन परिवारों ने अपनी अधिकांश विरासत खो दी, उन्हें जीविका का जरिया अनिवार्य तौर पर मिलना ही चाहिए। आखिर हम एक आजाद देश के वासी हैं और भूमि अधिग्रहण पर राज्य की सार्वभौमिक सत्ता का वह रूप हमें स्वीकार्य नहीं हो सकता जो गुलामी के दौर में था। रोजगार और विकास के नाम पर बरगलाने का खेल हमारे साथ अब और नहीं खेला जा सकता है।सरकार को चाहिए कि वह अब विकास के प्रति सही समझ पैदा करे। एकांगी विकास से किसी देश का भला नहीं हो सकता। केवल अरबपति पैदा करना समृद्धि का लक्षण नहीं है। प्रत्येक वर्ष देश के हजारों लोग अपनी जमीन से बेदखल होते हैं। किसान ही नहीं, आदिवासियों तक को अपने आशियानों से दर-ब-दर होना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, वंचितों के विद्रोह को दबाने का भी हर संभव प्रयास किया जा रहा है। उन पर गोलियां चलाई जा रही हैं। डंडे बरसाए जा रहे हैं। यह आर्थिक विषमता और लोगों के हक छीनने का ही नतीजा है कि नक्सलवाद जैसी समस्याएं पैदा हुई हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि नक्सलवाद के पीछे भी मूल रूप से आर्थिक विषमता और जमीन का सही बंटवारा नहीं होना है। सरकार जमीन का सही वितरण करने की जगह जमीन जबरन छीन औद्योगिक घरानों को दे रही है। सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून पर हालांकि कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं है, यह याद रखना चाहिए।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आइएसी) के अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष नितिन गडकरी पर निशाना साधा है। केजरीवाल ने कहा कि गडकरी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बीच संबंधों की जांच होनी चाहिए। वहीं भाजपा अध्यक्ष ने केजरीवाल के इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। वहीं पार्टी भी पूरी तरह से अध्यक्ष के बचाव में आ गई और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने खुद गडकरी का बचाव किया।अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी पर खुलासा करते हुए बुधवार को सवाल उठाए हैं कि वो किसके हक में काम कर रहे हैं। वो किसके इंट्रेस्ट को रिप्रेजेंट करते हैं? महाराष्ट्र में 71 हजार करोड़ का सिचाई घोटाला सामने आया है। कांग्रेस-एनसीपी की मिलीजुली सरकार के दौरान बीजेपी ने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी मदद नहीं की। गडकरी ने अंजली दमानिया को कहा कि शरद पवार से उनके अच्छे रिश्ते हैं। चार काम वो करते हैं तो चार काम वो उनका करते हैं।हालांकि बाद में मीडिया में गडकरी ने इससे इंकार किया था। मुंबई में आईएसी की सदस्य अंजली दमानिया और प्रीति ने सिंचाई घोटाले की जांच की। एक महीने की जांच में चौंकानेवाले तथ्य सामने आए हैं। अरविंद ने सवाल उठाया कि विदर्भ में किसान खुदकुशी क्यों कर रहे हैं? जब आईएसी की सदस्य एक महीने में जांच कर तथ्य सामने ला सकती हैं तो सरकारें क्या कर रहीं हैं? जांच एजेंसियां क्या कर रही हैं?अन्ना आंदोलन के दौरान अंजली दमानिया ने आरटीआई दाखिल की जिसके बाद उनको सबूत मिले की 70 हजार करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी किसानों को फायदा नहीं क्यों नहीं मिले? अरविंद ने खुलासा किया कि नागपुर के खुर्सापुर गांव में डैम बनाने के लिए जमीन अधिग्रहित की गई। इलाके के किसान गजानन रामभावजी घडगे की जमीन अधिग्रहित की गई। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि जितनी जमीन चाहिए थी उससे ज्यादा जमीन अधिग्रहित की गई।लेकिन डैम बनाने के बाद भी जमीन खाली पड़ी थी जिसपर सिंचाई विभाग के आदेश से गजानन उसपर खेती कर रहे थे, इसके लिए उन्होंने सिंचाई विभाग से आज्ञा ले रखी थी। बांध बन गया। 100 एकड़ जमीन खाली पडी थी। सिंचाई विभाग के इंजीनियर ने 18 एकड़ जमीन पर खेती की प्रमीशन दी। इसके बाद साल 2000 में किसानों ने सूबे के शासन को चिट्ठी लिखी और मांग की कि फालतु खाली पड़ी जमीन पर वो खेती करना चाहते हैं। वो जमीन उनको लीज पर या बेच दी जाए। लेकिन सिंचाई विभाग का जवाब आया कि जमीन पर सिंचाई बंद कर दी जाए। इस खाली पड़ी जमीन पर सौंदर्यीकरण का काम करना है।

4 जून 2005 को बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अजित पवार को चिट्ठी लिखी की उनको 100 एकड़ जमीन चाहिए। अजित पवार ने चार दिन यानि 8 जून को वीआईडीसी को कहा कि गडकरी के प्रस्ताव को 22 जून की बैठक में पेश किया जाए। इस बैठक में नितिन गडकरी की मांग को मंजूरी दे दी गई। हालांकि इसका सिंचाई विभाग ने विरोध किया कि कानून के तहत ऐसा करना संभव नहीं है।

28 नवंबर 2007 को एक और मीटिंग हुई और 100 एकड़ जमीन गड़करी को दे दी गई। 6 जून 2008 को घडगे ने लोकल एमएलए को लिखा कि ज्यादा अधिग्रहण होने पर बची हुई जमीन किसानों को वापस होनी चाहिए ऐसा कानून है। ये हमें वापस मिलनी चाहिए।

21 जून 2008 को घड़गे को बुलाया गया ,वहां गड़करी की कंपनी के कुछ अधिकारी थे, घड़गे को कहा गया कि ये जमीन अब गड़करी की कंपनी को दे दी गई है। इसे आपको छोड़ना होगा। 28 जून 2008 को जब वो लौटा तो गड़करी की कंपनी के एमडी ने कहा कि जो कर सकते हो कर लो, अब ये जमीन हमारी है।

उसी गांव में पंचायत ने प्रस्ताव पारित किया 19 अगस्त 2007 को प्रस्ताव पारित किया कि गड़करी की कंपनी का जो पावर प्लांट है, उसका गंध पीने के पानी में मिलता है। इसे बंद किया जाए।

अरविंद ने खुलासा करते हुए कहा कि नितिन गडकरी का बड़ा एंपायर है। उनका इसमें व्यासायिक इंट्रेस्ट हैं। क्या वो महाराष्ट्र के विदर्भा के किसानों के विरोध में है? क्या महाराष्ट्र के अंदर व्यवसाय किसानों की खुदकुशी पर हो रहा है? केजरीवाल ने कहा कि वो एक प्रश्न देश के सामने रखना चाहते हैं कि क्या बीजेपी देश की विपक्षी पार्टी है या बीजेपी सत्ताधारी पार्टियों से मिली हुई है। सवाल उठाते हुए अरविंद ने खुलासा किया कि गडकरी साहब का इंटरेस्ट क्या है। उनके बिजनेस हित क्या महाराष्ट्र के किसानों के हितों से टकरा रहे हैं? महाराष्ट्र के अंदर जो गड़करी के हित हैं उनकी कीमत किसान चुका रहे हैं?

जिस वक्त अरविंद केजरीवाल गडकरी के बारे में खुलासा कर रहे थे तो उसी वक्त गडकरी के घर पर बीजेपी के बड़े नेता सुषमा स्वराज, विजय गोएल, बलबीर पुंज और प्रकाश जावड़ेकर मौजूद थे।

राबर्ट वड्रा से के भूमि सौदे की जांच की मांग को खारिज करते हुए कांग्रेस ने आज कहा कि हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका द्वारा सोनिया गांधी के दामाद से संबंधित भूमि सौदे की जांच का आदेश बाद में विचारित काम है।

पार्टी प्रवक्ता राशिद अल्वी ने यहां संवाददाताओं से बातचीत करते हुए वड्रा के खिलाफ आरोपों को 'पूरी तरह से आधारहीन' बताया। उन्होंने कहा कि किसी जांच की जरूरत नहीं। जांच आवश्यक नहीं है। मैं सिरे से नकारता हूं। उनसे संववाददाताओं ने पूछा था कि क्या कांग्रेस इस मामले में व्यापक जांच कराने की वकालत करेगी क्योंकि हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने वाड्रा के भूमि सौदों पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

अल्वी ने कहा कि यदि कोई जांच करवाई जानी है या कोई कदम उठाया जाना है तो वह भारत सरकार या किसी उपयुक्त एजेंसी के समक्ष की गई शिकायत के आधार पर होनी चाहिए। खेमका के तबादले के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि अधिकारी का तबादला 11 अक्टू बर को हो गया था और उन्होंने वड्रा से जुड़े भूमि के बारे में निर्णय बारह और पंद्रह अक्तूबर को लिया। यानी तबादले से इस निणर्य का कोई वास्ता नहीं है।

अल्वी ने कहा कि मीडिया की खबरों के मुताबिक उक्त अधिकारी का 40 बार तबादला हुआ है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि आखिर 39 बार जब उनका तबादला हुआ था तो किसी ने उनके तबादले पर सवाल नहीं उठाया।

अल्वी ने कहा कि ऐसा नहीं है कि कि बगैर किसी कारण के 39 तबादले हुए होंगे। कोई न कोई कारण रहा होगा। इसके पीछे जरूर कोई न कोई प्रशासनिक कारण रहा होगा जिसके बारे में हरियाणा के मुख्यमंत्री बेहतर बता सकते हैं। अल्वी ने कहा कि हरियाण सरकार ने खेमका द्वारा उठाए गए मुद्दे की जांच के लिए एक समिति गठित की है। जो एक महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट दे देगी।

समझौते से क्या मिला भूमिहीन ग़रीबों को?
http://www.bhaskar.com/article/landless-agreement-rj-3910058.html


हज़ारों प्रदर्शनकारी जमीन के मालिकाना हक के लिए पदयात्रा कर रहे थे

ज़मीन का मालिकाना हक़ माँगने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से पदयात्रा करते हुए दिल्ली की ओर रवाना भूमिहीनों से केंद्र सरकार ने समझौता कर लिया है.


लेकिन इस समझौते में आश्वासन ज़्यादा ठोस उपाय कम हैं.


सरकार ने ज़्यादातर माँगों के बारे में कह दिया है कि वो इस पर राज्य सरकारों से जल्दी ही बातचीत का सिलसिला शुरू करेगी और उन्हें भूमि संबंधी क़ानूनों को लागू करने के लिए तैयार करेगी.


इस समझौते की घोषणा केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने आगरा के पास छावनी क्षेत्र में पड़ाव डाले हुए हज़ारों भूमिहीनों के बीच जाकर की है. इस मौके पर उनके साथ फर्रुखाबाद के सांसद राज बब्बर भी मौजूद थे.


ये तय किया गया है कि जयराम रमेश के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स का गठन किया जाएगा जो समझौते को लागू करने का काम करेगी.


राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनसीए) के सदस्य और भू-संबंधी मामलों के विशेषज्ञ एनसी सक्सेना कहते हैं कि इस समझौते में 'काफी भुलावा है'.


ज्यादातर मामलों में फैसला करने के लिए राज्य सरकारों से बात करने की बात कही गई है. पर सक्सेना कहते हैं कि बहुत सारे मसले केंद्र सरकार के अधीन है पर उसके बारे में कोई बात नहीं कही गई है.



आश्वासन ही आश्वासन

पिछले कुछ वर्षों से जमीन अधिग्रहण के खिलाफ देश के कई हिस्सों में काफी उग्र आंदोलन चल रहे हैं. उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाक़ों में सुरक्षा बल माओवादियों के साथ गंभीर संघर्ष में उलझे हुए हैं.


दिल्ली के पास भट्टा पारसौल गाँवों में किसानों और पुलिस के संघर्ष के बाद ज़मीन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में छा गया था.


एकता परिषद नाम के गैर-सरकारी संगठन की ओर से भूमिहीनों को एकजुट करके दिल्ली लाने वाले पीवी राजगोपाल ने कुछ दिन पहले ही इस बात की उम्मीद जताई थी कि सरकार से उनका समझौता हो जाएगा.


उन्होंने कहा था कि अगर समझौता हो गया तो फिर भूमिहीन रास्ते से ही अपने घरों को लौट जाएँगे.


कुछ साल पहले भी एकता परिषद के नेतृत्व में भूमिहीनों ने दिल्ली कूच किया था. उस समय उन्हें आश्वासन दिया गया था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स बनाई जाएगी जो भूमिहीनों के मुद्दों को हल करेगी.


पर अब तक इस टास्क फोर्स की एक भी बैठक नहीं हो पाई.


जानकार कहते हैं कि सबसे पहले भूमि सुधार कानून के मसौदे को दुरस्त किया जाना चाहिए जिसे ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने बनाया है. आदिवासियों की जमीन खनिद संपदा दोहन के लिए ले ली जाती है और उन्हें कोई फायदा नहीं होता.


हिंसा का दुष्चक्र
सक्सेना का मानना है कि या तो आदिवासी खुद पर हो रहे अत्याचारों को चुपचाप सहन करते हैं या फिर बंदूक उठा लेते हैं. बीच का रास्ता अपनाते हुए संगठित विरोध नहीं करते.


वो कहते हैं, "जनतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने पर भी अगर सरकार उन्हें कुछ नहीं देती तो आदिवासी वो फिर बंदूक उठाएँगे."


उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने 2005 में सुझाया था कि जमीन का विरासती अधिकार महिलाओं को भी मिलना चाहिए लेकिन सरकार ने आज तक ये पता नहीं किया है कि कितनी महिलाओं को विरासत में ज़मीन दी गई है.


सक्सेना कहते हैं कि सबसे पहले भारत सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून को दुरस्त करना चाहिए. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य की हैसियत से उन्होंने कहा कि इस परिषद ने उसमें (किसानों और भूमिहीनों के पक्ष में) जो भी प्रावधान सुझाए थे कोयला और खनिज मंत्रालयों ने दबाव डाल डाल कर उन्हें निकलवा दिया.

New Land Bill will Further Intensify Conflicts
New Delhi, October 17 : Draft Land Acquisition, Resettlement and Rehabilitation Bill (retitled as Right To Fair Compensation And Transparency In Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Bill, 2012) is touted by UPA government as a remedy for infusing animal spirit in economy, satisfying investor's sentiment and addressing the ongoing land conflicts. However, the current draft of the Bill which has been accepted by the Group of Minister's is a retrograde step will only facilitate the transfer of precious natural resources to the private corporations and facilitate further corruption and fuel land conflicts.
Historic Failure to Learn from Past
65 years of developmental process in the country has thrown up enough experience - starting from a mixed economy to current crony capitalist model - even then the Bill has not taken in account any of those lessons. Failure of resettlement and rehabilitation in Bhakra dam and many other projects to withdrawal of World Bank from Sardar Sarovar citing environmental violations and complete lack of R&R or death of farmers in Nandigram, Kalinganagar and other places should have given enough reason for the government to give up the whole framework of acquisition of land using the 'eminent domain' principle. It is extremely unfortunate that putting aside every possible democratic precedent and institutions, progressive pronouncements of the Supreme Court, UPA government ruling in the name of aam aadmi is bringing a law to legitimise forcible acquisition by the government for private and PPP projects in the name of development and to placate the investors and their representatives in the Ministry of Trade & Commerce, Finance, Urban Development, Planning Commission and other Ministries.
It is no wonder and seems to be only expected from a government which is being run on the life support given by the private corporations and on their money, especially after completely anti-people decisions in form of allowing FDI in retail and aviation, hike in diesel prices and electricity tariff, disinvestment of public sector units and other related measures.
The Bill will be placed before the Cabinet but we would like to express our opposition to such a legislation which is going to deprive the nature resource based communities of their livelihood and fails to accommodate key recommendations of the Parliamentary Standing Committee comprising of members from different political parties.
Acquisition for Privtae Corporations and PPP Projects
PSC very clearly has said that no acquisition should be allowed for the private and PPP projects, since they are nothing but a loot of natural resources. The unfolding corruption cases involving auction of coal blocks and spectrum, irrigation scam and others, all testify to greed and illegality in private and PPP projects. It is time for shunning the eminent domain framework of the state rather than expanding it to be a tool in service of private capital. It will be a move for the worse and fundamentally damage the socialist and egalitarian fabric of the constitution, as propounded in the directive principles of state policy or mandated in the Article 243.
Consent of Gram / Basti Sabha
NAPM along with many other movement groups under the banner of Sangharsh have been demanding free prior informed consent of the Gram / Basti Sabha for deciding nature of public purpose, to approval of the project and their participation in R&R and various steps of project implementation. Unfortunately under the pressure from industry and their lobbyists even a 80 percent consent clause of the project affected people is now being reduced to the two third of the land losers alone. Similarly, small benefits like a house plot to those displaced are being taken away by increasing the time of residence from three years to five years prior to displacement. Inspite of numerous deliberations with the Ministry, displacement in urban centres seems to be no where on radar, a separate legislation on the urban evictions and displacement is the only way out now.
Retrospective Application of the Bill
The new formulation says that the Bill shall apply prospectively only, i.e., for new acquisitions only, and not retrospectively. Earlier the Bill was to apply retrospectively, i.e., to ongoing land acquisitions where Award had not been made or possession not taken.
This is nothing but further dilution, since we have been saying that nearly 10 Crore people have been affected by various 'development' projects since independence with a very low rate of R&R, nearly 17-20 percent. A new legislation should move forward in addressing the historical injustice committed on the scheduled caste and scheduled tribe who constitute the majority of PFAs by setting up a National Resettlement and Rehabilitation Commission to address their claims of R&R rather than feeling proud in denying their share in development of the nation. It is shameful and nothing else !
Land Conflicts
A concerted effort is being made by the UPA to say that they are trying to protect the interests of the farmers and communities dependent on the land but unfortunately none of the actions by the government seem to demonstrate that. No wonder if approval to such a Bill by the group of Ministers will only add to discrediting the government, since it seems to be ruling for the interests of the private and multinational corporations alone and not for the people who voted it to power.
The Bill if accepted in current form will not only increase the conflicts surrounding the land across the country as being witnessed around the various infrastructure projects but will prove fatal for it in the next general elections. UPA must heed to the voices of the people, real investors' and not to the investors holding fictitious wealth. People and communities are real investors, who hold control of land, water, forest, minerals and most important their labour.
Role of Ministry of Rural Development and Other Ministries
Ministry of Rural Development recently signed an agreement with Ekta Parishad and talked about formulating a policy for ensuring homestead titles for landless, we wonder how serious they are, given the Bill which has just been agreed. The Bill in current form will take away the land rights or titles given to anyone either under the Forest Rights Act or by the proposed new legislation. Let the message be clear that no matter what the Cabinet decides but ultimately the Bill has to be passed through the Parliament where we hope the will of people will prevail and not of market. We will continue to struggle against such draconian laws and pose stiff resistance to loot of precious natural resources and strive for land rights.
Finally, we would also urge that Ministry of Social Justice and Empowerment, Tribal Affairs, Environment and Forests and Urban Housing who are mandated to look after the interests of the marginal communities must assert themselves and protect their rights or else what is the point of having such ministries, when their rights are being trampled in the interest of business and commerce ?
Medha Patkar, Dr. Sunilam, Prafulla Samantara, Roma, Gautam Bandopadhyay, Vimal Bhai, Suniti S R, Bhupinder Singh Rawat, Dr. Rupesh Verma, Advocate Aradhana Bhargava, Rajendra Ravi, Madhuresh Kumar

For details call : Madhuresh 9818905316



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नए भूमि अधिग्रहण कानून की अनिवार्यता

मेधा पाटकर
अलीग़ढ के किसानों द्वारा एक्सप्रेस वे के अतिरिक्त इसके इदगिर्द स्थित हजारों गांवों की कुछ किलोमीटर तक की जमीनें हडपने का आरोप लगाने के बाद, देश की राजनीति तय करने वाले उत्तरप्रदेश की राजनीतिक भूमि पर हलचल मच गई और तमाम राजनेताओं को इस विषय पर अपनी भूमिका स्पष्ट भी करना पडी।

भूमि अधिग्रहण एक बार पुन: नए सिरे से मुद्दा बन गया है। पहले भी नर्मदा से लेकर नंदीग्राम और रायग़ढ से लेकर सोमपेटा तक यह ज्वलंत मुद्दा था।

राज्य का सार्वभौम सत्ता का अधिकार नहीं बल्कि 'अहंकार' किसानों, आदिवासियों, दलितों की भूमि पर आमण कर भरे पूरे गांवों को खत्म कर वहां शहर बसाने के लिए बिल्डरों और कंपनियों को कर में राहत देते हुए उन्हें उजाडने की साजिश कर रहा है। यह अहंकार 'सेज', नदी व नदीघाटियों को समाप्त कर वहां रहने वाले समाज और संस्कृति को नष्ट करने में भी साफ दिखाई देता है। अब समय आ गया है जब इस अधिग्रहण में कितना विकास और कितना सार्वजनिक हित है का जवाब जनता को दिए जाने को भूमि अधिग्रहण की पूर्व शर्त माना जाए। इसलिए इस ब्रिटिशकालीन भूमि कानून के खिलाफ संघर्ष को तेज करना आवश्यक है।

राज्य द्वारा 'विकास' के नाम पर किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष कर रहे माओवादियों से हथियार डालने के बाद चर्चा का वादा करती नजर आती सरकारें देश भर में नदी घाटियों से लेकर खनन और सेज के विरुध्द चल रहे अहिंसक आन्दोलनों से चर्चा करने से न केवल बचती रही हैं बल्कि इन स्थानों पर राज्य अपना एजेंडा थोपती नजर आती है। अलीग़ढ में दो किसानों की शहादत के बाद ही सही पर राजनीतिक दलों द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून में 'नियोजित संशोधनों' को जिस तेजी से लोकसभा में पारित कराने की घोषणा की गई है उससे लगता है कि राजनीतिज्ञ इस मसले पर अभी भी गंभीर नहीं हैं।
इससे पहले 1998 में एक प्रयास हुआ था इसके बाद 2008 में और इन दोनों के बीच जिस तरह 2005 में बिना बहस के संसद ने 'सेज' कानून को पारित किया ठीक उसी तरह इस बार भी कुछ संशोधनों के साथ भूमि अधिग्रहण कानून को पारित करने के प्रयास होंगे।

भूमि अधिग्रहण की संकल्पना की बुनियाद में है 'राज्य की सार्वभौम सत्ता' का सिध्दांत। इसमें भूमि और उससे जुड़े सभी प्राकृतिक संसाधन और संपदाएं शामिल हैं। साम्राज्यवादी शासकों की इन आवश्यकताओं को आजाद भारत के शासकों ने न केवल ज्यों का त्यों अपनाया बल्कि 1984 में कंपनियों के लिए जमीन उपलब्ध करवाने को भी सार्वजनिक हित की परिभाषा में लेकर औपनिवेशिक शासकों को भी पीछे छोड़ दिया। इसके बाद शोषण का नया दौर उद्योग और रोजगार के नाम पर शुरू हो गया और आज खेती, किसानी और खाद्य सुरक्षा विनाश के कगार पर खड़ी हैं। इसी के साथ खेती और उस पर निर्भर समाज की अवमानना का दौर भी प्रारंभ हो गया। इसका सत्यापन इस बात से होता है कि नए मसौदे में और भी खतरनाक प्रावधान हैं। इसके अंतर्गत निवेशक द्वारा 70 प्रतिशत निजी भूमि क्रय करने पर बकाया 30 प्रतिशत सरकार द्वारा अधिग्रहित कर देने का प्रावधान धमकी के रूप में कार्य करेगा।

सारी दुनिया में लोकतंत्र का डंका बजाने वाले भारत को यदि शर्मिंदा होने से बचना है तो उसे वर्तमान भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द ही करना होगा। इसके बदले एक व्यापक विकास नियोजन का कानून प्रस्तावित करना होगा। इसके अन्तर्गत शासन को कुछ संसाधन अपने हक में लेने का अधिकार तो होगा लेकिन लोकतंत्र की चुनी हुई स्थानिक इकाईयों द्वारा अपरिहार्य न्यूनतम अधिग्रहण की मंजूरी देने के बाद ही ऐसा संभव हो पाएगा। इसके लिए सर्वप्रथम जरूरी है खेती से गैर खेती के कार्यों में भूमि को हस्तांतरित करने पर रोक लगाना। जिस तरह सैध्दान्तिक तौर पर भारत में धरती पर 33 प्रतिशत वनोच्छादन को स्वीकृति मिली है ठीक उसी प्रकार भूमि को खाद्यान्न उपजाने के लिए भी सुरक्षित रखा जाना अनिवार्य है।

ग्रामसभाओं को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों को मान्यता प्रदान कर उनकी असहमति की स्थिति में अधिग्रहण स्थगित कर दिया जाना चाहिए। इसी के साथ यह भी तय करना होगा कि विकास में समता, न्याय के साथ ही साथ न्यूनतम विनाश और विस्थापन हो। यह भी स्पष्ट है कि अब सब कुछ सत्ता की होड़ में लगे राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता । नए कानून में देश के 6 लाख गांवों को योजना की स्वीकृति का अधिकार देना होगा। साथ ही केंद्रीकृत सत्ता, विदेशी साहूकारी संस्थाओं या कंपनियों, पूंजीपतियों की चापलूसी करने वाले नियोजर्नकत्ताओं, प्रकृति से अंजान और परावलंबी बुध्दिजीवियों को भी अपना-अपना स्थान दिखाना होगा।

विकास की दौड़ में हम आज जो खोते जा रहे हैं वह हमारे जीवन व जीविका के आधार हैं। यह दौड़ विस्थापितों को अपमानित, पूर्णत: वंचित एवं निर्वासित कर अपना असर दिखा रही है। इस स्थिति को बदलना होगा। विस्थापन के नए और व्यापक कानून में 'पुनर्वास' की परिभाषा और प्रक्रिया का स्पष्ट और न्यायपूर्ण होना आवश्यक है। इसके अन्तर्गत गंभीर रूप से प्रभावित परिवारों को जीविका के वैकल्पिक आधार की उपलब्धता पर ही विस्थापित किए जाने का प्रावधान होना चाहिए। विस्थापन को न्यूनतम रखे जाने पर ही पुनर्वास संभव है अन्यथा इससे भ्रष्टाचार और अत्याचार जन्म लेते रहेगें।

नर्मदा घाटी के पिछले 25 वर्षों के संघर्ष में हमने कई बार नई राष्ट्रीय पुनर्वास नीति लाने का प्रयास भी किया है। केंद्रीय मंत्रालयों और योजना आयोग से इस मसले पर संवाद और संघर्ष दोनों ही किए हैं। वर्ष 2003 में मंजूर हुई राष्ट्रीय पुनर्वास नीति पर अभी तक अमल नहीं हुआ है। इसे लागू करने हेतु सचिवों की उच्चस्तरीय समिति ने 2009-10 तक एक बार भी बैठक नहीं की है। ऐसे में न्यूनतम विस्थापन के साथ नियोजन के उध्देश्य की पूर्ति कैसे संभव है? 'अगर-मगर' की रट लगाकर सिंचाई परियोजनाओं को अगर उसी जिले में शासकीय खेतजमीन उपलब्ध है तो मंजूरी दे दी जाएगी जैसे प्रावधान नए पुनर्वास कानून में भी जारी हैं। न्यूनतम 400 परिवारों के उज़डने पर ही इस कानून के लागू होने के प्रावधान का क्या अर्थ है? आवश्यकता है परिवार के साथ ही साथ पूरे गांव, समाज या प्राकृतिक इकाई जैसे नदी घाटी पर परियोजना के प्रभावों के आकलन करने के पश्चात ही अनुमति दी जाए। इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक स्तर पर पूर्ण सामाजिक, पर्यावरणीय व आर्थिक अध्ययन किया जाए। प्रस्तुत मसौदे में केवल अध्ययन का प्रावधान है पर उनके निष्कर्षों के आधार पर योजना के संबंध में निर्णय लेने की बात टाल दी गई है।

इस परिप्रेक्ष्य में देश भर के जनसंगठनों ने व्यापक 'विकास नियोजन कानून' के पक्ष में आवाज उठाई है। इसका मसौदा भी जनसंगठनों ने वर्ष 2005 में तैयार कर लिया था। उस समय प्रभावशील राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी इसे मंजूर किया था। इसके बाद मंत्री परिषद ने इस कृषि मंत्री की अध्यक्षता में गठित मंत्री समूह को सौंप दिया था। नए मसौदे को अस्वीकार करते हुए हमारा प्रश्न है कि तत्कालीन राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा पारित मसौदे को स्वीकार क्यों नहीं किया गया? इसका तुरंत जवाब दिया जाना आवश्यक है। अन्यथा असंतोष बढ़ेगा और विद्रोह भी। अतएव राज्य को ही नहीं बल्कि समाज को भी इस विषय में तुरंत निर्णय लेना होगा। वरन अहिंसक व शस्त्रहीन किसानों और आदिवासियों को हम किसके भरोसे और कौन सा दूसरा मार्ग बताएंगे? यदि देशभर में संवाद बनाए जाए तो संघर्ष के जारी रहते भी, बिना विस्थापन विकास की ओर ले जाने वाला रास्ता अवश्य निकलेगा।
http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/1674/10/8


भूमि अधिग्रहण कानून की नहीं भूमि रक्षा कानून की जरूरत

भारत डोगरा
भूमि सुधारों के लिए, एक लाख वंचितों की पदयात्रा

आज देश को भूमि अधिग्रहण कानून की नहीं भूमि रक्षा कानून की जरूरत है। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि उपजाऊ कृषि भूमि को अन्य उपयोग में जाने से जहां तक संभव हो रोका जा सके या इस संभावना को न्यूनतम किया जा सके। वनाधिकार कानून या फारेस्ट राईट्स एक्ट से आदिवासियों व परंपरागत वनवासियों को राहत मिलने व विवादित भूमि के मामले सुलझाकर अधिकार पत्रक मिलने की बहुत उम्मीद थी। पर क्रियान्वयन के दौर में यह कानून इतनी बुरी तरह भटक चुका है कि इससे आदिवासियों व परंपरागत वनवासियों को राहत तो क्या मिलती अनेक स्थानों पर उनकी परेशानियां और बढ़ गई है।
3 अक्टूबर को ग्वालियर से दिल्ली की ओर वंचितों की विशाल पदयात्रा आरंभ हो गई है। इसमें आरंभ में लगभग 50000 से 60000 मजदूर व किसान, दलित व आदिवासी व अन्य निर्धन गांववासी शामिल हैं, पर उम्मीद है कि दिल्ली पंहुचते-पंहुचते इन पदयात्रियों की संख्या एक लाख तक पंहुच जाएगी। 350 किमी. की यह पदयात्रा लगभग 26 दिनों में पूरी होने की उम्मीद है।

यह पदयात्रा 'जन-सत्याग्रह' आंदोलन के अन्तर्गत की जा रही है। यह देश में न्यायसंगत भूमि-सुधारों के लिए सबसे बड़ा अहिंसक आंदोलन है। इसमें प्रमुख भूमिका एकता परिषद की है, व एकता परिषद ने अपने नाम के अनुकूल कार्य करते हुए इस आंदोलन से लगभग 2000 अन्य जन-संगठनों को जोड़ा है। इससे पहले एकता परिषद ने वर्ष 2007 में भी भूमि सुधार के लिए 'जनादेश' आंदोलन किया था।

वैसे उम्मीद तो यह थी कि 2 अक्टूबर को ग्रामीण विकास मंत्री इस पदयात्रा के आरंभ होने से पहले ही भूमि सुधार के कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण कदमों की घोषणा कर देंगे जिसके आधार पर इस विशाल पदयात्रा के कार्यम को आंदोलनकारी वापस ले सकते थे। सरकार व आंदोलनकारियों के बीच चले संवाद से ऐसी उम्मीद उत्पन्न हो रही थी। पर 2 अक्टूबर को उम्मीद के अनुकूल घोषणाएं ग्रामीण विकास मंत्री नहीं कर पाए तो आंदोलनकारियों ने भी घोषणा कर दी कि अब विशाल पदयात्रा दिल्ली के लिए कूच कर देगी।  यदि हमारे देश में ग्रामीण निर्धन वर्ग व विशेषकर भूमिहीन वर्ग को टिकाऊ तौर पर संतोषजनक आजीविका मिलनी है तो इसके लिए भूमि-सुधार बहुत जरूरी है। इसके अतिरिक्त अन्यायपूर्ण भूमि अधिग्रहण द्वारा जिस तरह तेजी से बहुत से किसानों (विशेषकर आदिवासियों) की जमीन लेकर उन्हें भूमिहीन बनाया जा रहा है, इसपर रोक लगाना भी जरूरी है। आज स्थिति यह है कि वर्षों से पट्टा प्राप्त अनेक तथाकथित लाभार्थियों को भी अभी तक भूमि पर वास्तविक कब्जा नहीं मिल पाया है व वे भूमि नहीं जोत सके हैं। इस बारे में राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलना चाहिए कि पट्टा प्राप्त करने वाले परिवारों को वास्तविक कब्जा मिल सके व वे इस भूमि को जोत सकें। सरकार के पास ऐसी रिपोर्टों व अध्ययनों की कमी नहीं है जो विस्तार से बताएं कि भूमि सुधार कानूनों व उन्हें क्रियान्वयन में कहां कमी रह गई। लाल बहादुर शास्त्री अकादमी, मसूरी में इस मुद्दे पर अच्छा अनुसंधान हुआ व कई सरकारी अधिकारियों ने भूमि सुधार को बेहतर करने व सब भूमिहीन (या लगभग भूमिहीन) परिवारों को कुछ भूमि उपलब्ध करवाने की राह बताई। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना तैयार करते समय भूमि संबंधों पर जो वर्किंग ग्रुप स्थापित किया गया था व उसकी रिपोर्ट में भी कई महत्वपूर्ण सुझाव हैं। जनादेश 2007 आंदोलन के बाद सरकार द्वारा नियुक्त भूमि-सुधार समिति ने कई मूल्यवान सुझाव दिए हैं। ऐसी रिपोर्टों व अध्ययनों के आधार पर सरकार को ऐसे नीति-निर्देश तैयार करने चाहिए जो राय सरकारों के लिए भूमि सुधारों संबंधी कमियों को दूर करने में वास्तव में सहायक सिध्द हों। केन्द्रीय सरकार ग्रामीण व कृषि विकास की ऐसी महत्वपूर्ण स्कीमें शुरू कर सकती है जिनके अन्तर्गत काफी बड़ी विकास राशि उपलब्ध हो पर यह पूरी तरह भूमिहीनों में भूमि वितरण से जुड़ी हो। जिन राज्यों में भूमि वितरण का लाभ अधिक भूमिहीनों तक पंहुचा है, वहां इन नए किसानों की सफल खेती के लिए लघु सिंचाई, जल व मिट्टी संरक्षण, भूमि समतलीकरण आदि के लिए सहायता उदारता से उपलब्ध करवानी चाहिए। जो राय सरकार जितने अधिक भूमिहीनों को भूमि वितरण करेगी, उसे उतनी ही अधिक सहायता राशि मिलेगी। दूसरी ओर जो सरकारें इन मामलों में उदासीन हैं उन्हें इस सहायता के लाभ से वंचित रखा जाएगा। विभिन्न कारणों से भूमंडलीकरण के इस दौर में विस्थापन बहुत बढ़ गया है जिससे बहुत तेजी से हमारे किसानों की जमीन छिन रही है व उपजाऊ कृषि भूमि को उद्योगों, खनन आदि के लिए अधिग्रहित किया जा रहा है। जैसा कि इस विस्थापन से त्रस्त लोग कह रहे हैं, आज देश को भूमि अधिग्रहण कानून की नहीं भूमि रक्षा कानून की जरूरत है। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि उपजाऊ कृषि भूमि को अन्य उपयोग में जाने से जहां तक संभव हो रोका जा सके या इस संभावना को न्यूनतम किया जा सके। वनाधिकार कानून या फारेस्ट राईट्स एक्ट से आदिवासियों व परंपरागत वनवासियों को राहत मिलने व विवादित भूमि के मामले सुलझाकर अधिकार पत्रक मिलने की बहुत उम्मीद थी। पर क्रियान्वयन के दौर में यह कानून इतनी बुरी तरह भटक चुका है कि इससे आदिवासियों व परंपरागत वनवासियों को राहत तो क्या मिलती अनेक स्थानों पर उनकी परेशानियां और बढ़ गई है।

सरकार को चाहिए कि बिना देरी किए इन समस्याओं का समाधान करे ताकि वन अधिकार कानून से आदिवासियों व परंपरागत वनवासियों को वास्तव में राहत मिल सके। साथ ही सरकार की शीघ्र से शीघ्र भूमि-सुधार संबंधी व्यापक महत्त्वपूर्ण निर्णयों की घोषणा करनी चाहिए।
http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/8112/9/196


भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894

भूमि अधिग्रहण को सरकार की एक ऐसी गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके द्वारा यह भूमि के स्‍वामियों से भूमि का अधिग्रहण करती है, ताकि किसी सार्वजनिक प्रयोजन या किसी कंपनी के लिए इसका उपयोग किया जा सके। यह अधिग्रहण स्‍वामियों को मुआवज़े के भुगतान या भूमि में रुचि रखने वाले व्‍यक्तियों के भुगतान के अधीन होता है। आम तौर पर सरकार द्वारा भूमि का अधिग्रहण अनिवार्य प्रकार का नहीं होता है, ना ही भूमि के बंटवारे के अनिच्‍छुक स्‍वामी पर ध्‍यान दिए बिना ऐसा किया जाता है।
संपत्ति की मांग और अधिग्रहण समवर्ती सूची में आता है, जिसका अर्थ है केन्‍द्र और राज्‍य सरकारें इस मामले में कानून बना सकती हैं। ऐसे अनेक स्‍थानीय और विशिष्‍ट कानून है जो अपने अधीन भूमि के अधिग्रहण प्रदान करते हैं किन्‍तु भूमि के अधिग्रहण से संबंधित मुख्‍य कानून भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 है।

यह अधिनियम सरकार को सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए भूमि के अधिग्रहण का प्राधिकरण प्रदान करता है जैसे कि योजनाबद्ध विकास, शहर या ग्रामीण योजना के लिए प्रावधान, गरीबों या भूमि हीनों के लिए आवासीय प्रयोजन हेतु प्रावधान या किसी शिक्षा, आवास या स्‍वास्‍थ्‍य योजना के लिए सरकार को भूमि की आवश्‍यकता। इससे उपयुक्‍त मूल्‍य पर भूमि के अधिग्रहण में रूकावट आती है, जिससे लागत में विपरीत प्रभाव पड़ता है।

इसे सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए शहरी भूमि के पर्याप्‍त भण्‍डार के निर्माण हेतु लागू किया गया था, जैसे कि कम आय वाले आवास, सड़कों को चौड़ा बनाना, उद्यानों तथा अन्‍य सुविधाओं का विकास। इस भूमि को प्रारूपिक तौर पर सरकार द्वारा बाजार मूल्‍य के अनुसार भूमि के स्‍वामियों को मुआवज़े के भुगतान के माध्‍यम से अधिग्रहण किया जाता है।

इस अधिनियम का उद्देश्‍य सार्वजनिक प्रयोजनों तथा उन कंपनियों के लिए भूमि के अधिग्रहण से संबंधित कानूनों को संशोधित करना है साथ ही उस मुआवज़े का निर्धारण करना भी है, जो भूमि अधिग्रहण के मामलों में करने की आवश्‍यकता होती है। इसे लागू करने से बताया जाता है कि अभिव्‍यक्‍त भूमि में वे लाभ शामिल हैं जो भूमि से उत्‍पन्‍न होते हैं और वे वस्‍तुएं जो मिट्टी के साथ जुड़ी हुई हैं या भूमि पर मजबूती से स्‍थायी रूप से जुड़ी हुई हैं।

इसके अलावा यदि लिए गए मुआवज़े को किसी विरोध के तहत दिया गया है, बजाए इसके कि इसे प्राप्‍त करने वाले को इसके प्रभावी होने के अनुसार पाने की पात्रता है, तो मामले को मुआवज़े की अपेक्षित राशि के निर्धारण हेतु न्‍यायालय में भेजा जाता है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 को प्रशासित करने वाली नोडल संघ सरकार होने के नाते समय समय पर कथित अधिनियम के विभिन्‍न प्रावधानों के संशोधन हेतु प्रस्‍तावों का प्रसंसाधन करता है।

पुन: इस अधिनियम में सार्वजनिक प्रस्‍तावों को भी विनिर्दिष्‍ट किया जाता है जो राज्‍य की ओर से भूमि के इस अधिग्रहण के लिए प्राधिकृत हैं। इसमें कलेक्‍टर, उपायुक्‍त तथा अन्‍य कोई अधिकारी शामिल हैं, जिन्‍हें कानून के प्राधिकार के तहत उपयुक्‍त सरकार द्वारा विशेष रूप से नियुक्‍त किया जाता है। कलेक्‍टर द्वारा घोषणा तैयार की जाती है और इसकी प्रतियां प्रशासनिक विभागों तथा अन्‍य सभी संबंधित पक्षकारों को भेजी जाती है। तब इस घोषणा की आवश्‍यकता इसी रूप में जारी अधिसूचना के मामले में प्रकाशित की जाती है। कलेक्‍टर द्वारा अधिनिर्णय जारी किए जाते हैं, जिसमें कोई आपत्ति दर्ज कराने के लिए कम से कम 15 दिन का समय दिया जाता है।

सभी राज्‍य विधायी प्रस्‍तावों में संपत्ति के अधिग्रहण या मांग के विषय पर कोई अधिनियम या अन्‍य कोई राज्‍य विधान, जिसका प्रभाव भूमि के अधिग्रहण और मांग पर है, में शामिल हैं, इनकी जांच राष्‍ट्रपति की स्‍वीकृति पाने के प्रयोजन हेतु धारा 200 (विधयेक के मामले में) या संविधान की धारा 213 (1) के प्रावधान के तहत भूमि संसाधन विभाग द्वारा की जाती है। इस प्रभाग द्वारा समवर्ती होने के प्रयोजन हेतु भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 में संशोधन के लिए राज्‍य सरकारों के सभी प्रस्‍तावों की जांच भी की जाती है, जैसा कि संविधान की धारा 254 की उपधारा (2) के अधीन आवश्‍यक है।
http://business.gov.in/hindi/land/land_acquisition_act_1894.php



भूमि अधिग्रहण बिल का ड्राफ्ट पास, क्या हैं फायदे-नुकसान



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नवभारत टाइम्स | Oct 17, 2012, 04.00AM IST
जोसफ बर्नाड।। मंत्रियों के एक समूह ने मंगलवार को भूमि अधिग्रहण बिल के ड्राफ्ट को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही मार्केट में इस पर चर्चा शुरू हो गई है। उम्मीद है कि संसद के आगामी शीत सत्र में इस बिल को पेश कर दिया जाएगा। इसमें कुछ अहम प्रावधान किए जाने की बातें सामने आई हैं। आम आदमी, कॉर्पोरेट और किसानों के लिए यह कितना फायदेमंद होगा:
आम आदमी
फायदा: सूत्रों के मुताबिक, बिल में यह प्रावधान किया गया है कि मार्केट रेट पर जमीन का अधिग्रहण किया जाएगा। इससे आम आदमी जमीन रेट के हिसाब से रिहायशी प्रॉजेक्ट की कीमत का आकलन कर सकेगा। बिल्डर कंपनियां जमीन के दामों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं कर पाएंगी। ऐसे में मार्केट में रिहायशी प्रॉजेक्टों की कीमतों में ज्यादा पारदर्शिता आएगी।
नुकसान: अगर कंपनियों ने किसी वजह से बढ़े हुए मार्केट रेट पर जमीन खरीदी तो वे प्रॉजेक्ट की कीमतें मनमाने तरीके से बढ़ा सकती हैं। ऐसे में मकान और फ्लैटों की कीमतें बढ़ने की आशंका है। मार्केट एक्सपर्ट केके मदान का कहना है कि बिल्डर्स कंपनियों पर नकेल कसने के लिए सरकार को इस बारे में सोच-समझकर कदम उठाना चाहिए।
किसान
फायदा: किसानों के लिए इस बिल में तीन अहम बातें हैं। पहला, अधिग्रहण के लिए दो-तिहाई किसानों की रजामंदी होनी चाहिए। दूसरा, गांवों की जमीन जितनी दूर-दराज की होगी, उसकी कीमत उतनी ज्यादा होगी। इसके पीछे तर्क यह है कि ऐसे इलाकों में जमीन ही किसानों की आजीविका का सहारा है। जमीन बेचने से उनको इतनी रकम मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जिंदगी गुजार सकें। तीसरा, जमीन की कीमतें मार्केट रेट पर आधारित होंगी।
नुकसान: बिल में यह बात साफ नहीं है कि मार्केट रेट का आधार क्या होगा। किस तरह से इसे निर्धारित किया जाएगा। किसानों की जमीन खेती वाली होगी। ऐसे में सरकार किस तरह जमीन की मार्केट कीमत तय करेगी। कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि मार्केट रेट सही तरीके से तय हो, इसके लिए कुछ मानदंड बनाने होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बात बिगड़ सकती है। जमीन बेचने के लिए पहले गांव के 80 फीसदी किसानों की मंजूरी जरूरी थी। अब इसे कम करके दो-तिहाई कर दिया है। इससे विवाद पैदा हो सकता है।
कॉर्पोरेट
फायदा: कोई भी प्रॉजेक्ट शुरू करते समय अब कंपनियों के दिमाग में सभी बातें साफ होंगी। वे समय के हिसाब से अपने प्रॉजेक्ट को शुरू और खत्म कर सकेंगी। अहम बात यह कि कंपनियों को किसी प्रकार का विवाद होने और प्रॉजेक्ट रुकने की टेंशन नहीं होगी।
नुकसान: जमीन पहले की तुलना में ज्यादा कीमत पर मिलेगी। इसके साथ सरकार जमीनों के अधिग्रहण के बाद पुनर्वास की जिम्मेदारी में भी काफी हद तक कंपनियों को भागीदार बनाने जा रही है। खास बात यह है कि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि अधिग्रहण के बाद क्या बाद में कंपनियों को मुनाफे का कुछ हिस्सा तय वक्त तक किसानों को देना होगा। इस पर कंपनियां परेशान हैं।
http://navbharattimes.indiatimes.com/Land-Acquisition-Bill-cleared-by-Group-of-Ministers/articleshow/16841418.cms