सुरेश वाडकर

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Wednesday, December 24, 2014

History of Reservation

History of Reservation

 
 
 
 
 
 
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हमारे मूल निवासी बहुजन समाज अर्थात एससी/ एसटी/ ओबीसी/ आपराधिक जन-जाति के बहुतांश पढे-लिखे विशेषतः अधिक पढे-लिखे लोगों को लगता है कि आरक्षण का मतलब बैसाखी है , भीख है ,लाचारीहै । किन्तु हमारे मूलनिवासी बहुजन समाज के महापुरुषों ने बहुत बड़ा संघर्ष कर आरक्षण अर्थात प्रतिनिधित्व पाया है । यह इतनी आसानी नहीं मिला बल्कि इसके लिए फुले-शाहू-पेरियार-अम्बेडकर को 1848 से1956 तक 108 वर्ष संघर्ष करना पड़ा । आरक्षण मुफ्त में मिलने के कारण हमें इसकी कद्र महसूस नहीं होती ।हवा व सूर्य प्रकाश मुफ्त में मिलता है इसीलिए उनकी कद्र महसूस नहीं होती । 
public-relation-degrees copyहमारे महापुरुषों का इतिहास आरक्षण समर्थकों का इतिहास रहा है । यूरेशियन ब्राह्मणो का इतिहास हमारे लिए आरक्षण के विरोधकों का इतिहास है । इसका अर्थ है कि आरक्षण का इतिहास , आरक्षण के नायकों व खलनायकों का इतिहास है । इसीलिए अपने शत्रु व मित्रों के बारे में जान लिया जाना चाहिए ,उन्हें पहचान लिया जाना चाहिए । 
(अ) “Idea of Reservation” अर्थात “आरक्षण का विचार ” 
“Idea of Reservation” अर्थात “आरक्षण का विचार ” राष्ट्र पिता जोतीराव फुले का है । यह विचार उन्होनेप्रथमतः 1869 व बाद में 1882 को अंग्रेज़ सरकार के सामने रखा ।
(ब) “Implementation Of Reservation” अर्थात”आरक्षण पर अमल”
“Implementation Of Reservation” अर्थात “आरक्षण पर अमल” आधुनिक भारत में सबसे पहले राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने अपने करवीर अर्थात कोल्हापुर राज्य में 26 जुलाई 1902 से किया ।
(स) Policy Of Reservation अर्थात “आरक्षण की नीति”
“Policy Of Reservation” अर्थात “आरक्षण कीनीति” विश्वरत्न महामानव बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर ने भारतीय संविधान के माध्यम से 26 जनवरी 1950 से सुनिश्चित की । राष्ट्र पिता जोतीराव फुले के आरक्षण के विचार को लागू करने का काम उनके प्रमुख शिष्य राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने किया। राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने 26 जुलाई 1902 को सभी ब्राह्मणेत्तर लोगों केलिए 50 % आरक्षण की घोषणा अपनी करवीर रियासत अर्थात कोल्हापुर रियासत में की । 664 रियासत में से मूलनिवासी बहुजन समाज केसाथ न्याय करने वाली मात्र 03 रियासत थीं (1) करवीर अर्थात कोल्हापुर (2) बड़ौदा(3) इंदौर । दो मराठा कुनबी व एक धनगर ।
राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने जो 50 % आरक्षण घोषित किया था उसमें सिर्फ चार जातियों को इससे अलग रखा । (1) ब्राह्मण (2) शेणवी (3) प्रभु (4) पारसी । इन 04 अगड़ी जाति छोडकर शेष सभी जातियों अर्थात ब्राह्मणेत्तरों अर्थात मूलनिवासी बहुजन समाज के लिए आरक्षण अर्थात प्रतिनिधित्व घोषित किया । इसे “Implementation of Reservation” कहा जाता है अर्थात “आरक्षण पर अमल” ।
राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने आरक्षण क्यों दिया ?
महाराज ने पहले निरीक्षण किया । इस निरीक्षण मेंउनकी नजर में आया कि सरकारी दरबारियों में उच्च पदों पर 71 में 60 यूरेशियन ब्राह्मण थे व सिर्फ 11 ब्राह्मणेत्तर थे। उसी तरह निजी सेवा में 52 में 45 यूरेशियन ब्राह्मण व 07 ब्राह्मणेत्तर थे । प्रशासन से असंतुलन दूर करने के लिए उन्होने सभी ब्राह्मणेत्तर लोगों के लिए 50 % आरक्षण की घोषणा की । पहले से सभी महत्वपूर्ण पदों पर काबिज माधव , बर्वे इत्यादि नामक चितपावन ब्राह्मणों ने नौकरियों को स्वयं की जाति के लोगों में बाँट दिया था ।
राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज के इस बहुजन उद्धारक क्रांतिकारी निर्णय का सभी ब्राह्मणों ने कडा विरोधकिया उनमें से निम्न उल्लेखनीय हैं :- 
(1) न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे । न्यायमूर्ति ही सामाजिक न्याय का विरोध कर रहे थे ।
(2) रघुनाथ व्यंकाजी सबनीस
(3) गोपाल कृष्ण गोखले
(4) एस एम परांजपे
(5) नरहरी चिंतामन केलकर
(6) दादासाहेब खापर्डे तथा
(7) एड॰ गणपतराव अभ्यंकर (सांगली )
(8) बाल गंगाधर तिलक
आरक्षण का विरोध करने वाले सभी ब्राह्मण थे । आज भी उनकी मानसिकता में कोई अंतर नहीं आया है । राजर्षि शाहू छत्रपति महाराज स्वयं राजा थे, राज्य के मालिक थे व अपने स्वयं के राज्य में अपनी बहुसंख्य प्रजाको आरक्षण दे रहे थे। उपरोक्त किसी भीब्राह्मण की जेब से अथवा किसी ब्राह्मण राज्य से नहीं दे रहे थे फिर भी उपरोक्त ब्राह्मणो ने ब्राह्मणेत्तरों के आरक्षण का विरोध किया ।
उनमेसे एक ब्राह्मण ने तो हद पार कर दी । उसका नाम एड॰ गणपतराव अभ्यंकर था । वह सांगली की पटवर्धन (ब्राह्मण) रियासत में नौकरी करता था । यह पटवर्धन कौन ? भाग्यश्री का दादा । भाग्यश्री कौन ? “मैंने प्यार किया “ हिन्दी सिनेमा में सलमान खान की नायिका। राजर्षिछत्रपति शाहू महाराज ने जैसे ही 50 % आरक्षण को लागू करने का कानून बनाया तभी सांगली की पटवर्धन रियासत में मुनीम एड॰ गणपतराव अभ्यंकर कोल्हापुर आया व राजर्षिछत्रपति शाहू महाराज से मिला । उसने (1) जाति आधारित छात्रवृति व (2) जाति आधारितनौकरी देने के निर्णय का विरोध किया । उसके अनुसार योग्यता देखकर ही छात्रवृति व नौकरी देना चाहिए ।
हालांकि राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने सभी ब्राह्मणेत्तरों के लिए जो 50%आरक्षण घोषित किया वह अपने स्वयं के करवीर अथवा कोल्हापुर राज्य में ही किया था लेकिन सांगली के पटवर्धन रियासत के एड॰ गणपतराव अभ्यंकर को इससे भयानक कष्ट हो रहा था । क्यों कष्ट हो रहा था ? क्योंकि इससे कोल्हापुर रियासत में यूरेशियन ब्राह्मणो की नौकरीयों में कमी होने वाली थी, उनका नुकसान होने वाला था । ब्राह्मणों कानुकसान नहीं होना चाहिए इसीलिए सांगली रियासत का एक ब्राह्मण कोल्हापुर आता है वछ्त्रपति शाहू महाराज को आरक्षण ना देने की सलाह देता है । इसे जातीय हित व जातीय चेतना या जातीय एकजुटता कहा जा सकता है । आज भी सभी राजनैतिक पार्टियों के ब्राह्मणो में ऐसी ही एकता है । वे सभी पार्टियों में रहकर भी एक होते हैं और हम एक पार्टी में रहकर भी बिखरे हुये होते हैं ।इसी कारण उनमें एकता होती हैं और हममें अनेकता । आरक्षण के मुद्दे का आज भी यूरेशियन ब्राह्मण कड़ा प्रतिरोध करते हैं । चाहे वह कांग्रेस, भाजपा, कम्युनिस्ट अथवा शिवसेना का ब्राह्मण हो या फिर अन्य किसी भी पार्टी का क्यों न हो । सभी ब्राह्मण आरक्षण का विरोध करते हैं । क्या आरक्षण बैसाखी है ? क्या आरक्षण भीख है ? क्या आरक्षण लाचारी है ? मानलो यदि ऐसा होता तो क्या यूरेशियन ब्राह्मणो ने विरोध किया होता ? इस मुद्दे पर पढे-लिखे लोगों लोगों को गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए विशेषतः जिन्होने आरक्षण से लाभ उठाया है तथा आज संपन्नता की स्थिति को प्राप्त हुये हैं। तो एड॰ गणपतराव अभ्यंकर ने सांगली से कोल्हापुर (54 किमी)आकर आरक्षण का विरोध किया ।लेकिन राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज जमीनी सुधारक थे कोई हवाई नहीं । इसके अलावा वे फ़ोंरेन रिटर्न भी थे । एड गणपतराव अभ्यंकर के ब्राह्मणी कपट को उन्होने ताड़ लिया ।राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज उन्हें अस्तबल में ले गए । अस्तबल में बहुत सारे घोड़े थे । राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज व एड॰ गणपतराव अभ्यंकर ने देखा कि सभी घोड़े मजे से अपने मुंह बंधे थैले में रखे चने खा रहे थे । तब राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने घोड़ों के रखवालों को घोड़ों के मुंह बंधे थैले को खोलकर उसमें रखे चनों को नीचे एक दरी में डालने का आदेश दिया । एड॰ गणपतराव अभ्यंकर यह गतिविधि अनमने भाव से देख रहे थे । जैसे ही रखवालों ने घोड़ों को खुला छोड़ा तो जो घोड़े मोटे-ताजे, निरोगीव ताकतवर थे वे दरी में रखे चनों पर टूट पड़े और दूसरी तरफ जो घोड़े दुबले-पतले, बीमार व कमजोर थे वे दूर खड़े होकर यह सब देख रहे थे । क्या देख रहे थे ? कि वे हट्टे –कट्टे, तगड़े, बलवान, निरोगी, मुस्टंडे घोड़े खाते समय भी ठीक तरह से नहीं खा रहे थे । फिर कैसे खा रहे थे ? वे मुंह से चने खाते थे व दुलत्ती भी देते जाते थे ताकि दूसरे घोड़े आने न पाएँ । इसीलिए कमजोर घोड़ों ने विचार किया । क्या विचार किया ? विचार किया कि चने खाने के लिए उन तगड़े घोड़ों के बीच न घुसा जाए । बेचारे अशक्त घोड़ों ने ऐसा विचार क्यों किया ? क्योंकि इन मुस्टंडों की भीड़ में यदि वे घुसते हैं तो चना तो मिलने से रहा लेकिन दुलत्ती अलग से जरूर पड़ेगी । इसीलिए उन्होने सोचा इनके बीच में क्यों घुसा जाए ? ऐसा विचार कर वे गरीब, अशक्त, लाचार घोड़े दूर से ही यह तमाशा देख रहे थे । तब राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने उन कमजोर घोड़ों की ओर उंगली दिखाकर एड॰ गणपतराव अभ्यंकर से कहा – “अभ्यंकर ! इन कमजोर घोड़ों का मैं क्या करूँ ?उन्हें गोली मार दूँ ? मैं पहले से जानता था ऐसा ही होगा इसीलिए मैंने प्रत्येक के हिस्से का चना उसके मुंह में बांध दिया था जिससे कोई दूसरा उसमें मुंह ना डाल सके । यही आरक्षण हैं । एड॰गणपतराव अभ्यंकर को उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था । तदुपरान्त राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने अ�
��्यंकर से कहा – “अभ्यंकर मनुष्यों में जाति नहीं होती वह जानवरों में होती है । तुमने जानवरों की व्यवस्था मनुष्यों पर लागू की और मैंने मनुष्यों की व्यवस्था जानवरों पर लागू की” अभ्यंकर क्या कहता ? उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई । उसने सिर नीचा कर लिया व चलते बना । असल में उसका उपनाम अभ्यंकर की जगह भयंकर होना चाहिए था। 
राजर्षि छत्रपतिशाहू महाराज आरक्षण के आद्य-जनक हैं । आरक्षण के नायक हैं । वे आधुनिक काल में सम्पूर्ण भारत में एकमात्र राजा है जिन्होने ब्राह्मणेत्तरों के लिए 50 % आरक्षण दिया। राष्ट्रपिता जोतीराव फुलेके “आरक्षण की संकल्पना” (Idea of Reservation) व राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज के “आरक्षण पर अमल”(Implementation of Reservation) को विश्वरत्न महामानव बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर ने “भारतीयसंविधान” द्वारा मूलभूत अधिकार (Fundamental Right) बना दिया । उन्होने 664 राज्यों में से 01 राज्य के आरक्षण को सम्पूर्ण देश में लागू करवा दिया । संविधान की धारा 340 के अनुसार ओबीसी को 52 % व धारा 341 के अनुसार अस्पृश्य अर्थात एससी को 15 % व धारा 342 के अनुसार आदिवासी अर्थात एसटी को 7.5 % तथा धारा 46 के अनुसार एक्स क्रिमिनल ट्राइब्स अर्थात भूतपूर्व अपराधी जनजाति अर्थात एन टी /डीएनटी /वीजेएनटी कोजनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था है । 108 वर्ष के लगातार व कठिनतम संघर्षों से प्राप्त आरक्षण को आज कांग्रेस, बीजेपी, कम्युनिस्ट व शिवसेना के ब्राह्मण एलपीजी अर्थात उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण के माध्यम से नष्ट कर रहे हैं । ब्राह्मणों ने एलपीजी के माध्यम से संविधान में बिना संशोधन किये संविधान को नष्ट करने का षड्यंत्रशुरू किया है ।